Gurutva jyotish aug 2011

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Gurutva jyotish aug 2011

  1. 1. Font Help >> http://gurutvajyotish.blogspot.comगु व कायालय ारा तुत मािसक ई-प का अग त- 2011 ी नवकार मं नव ह शांित तो विभ न चम कार जैनमं पयू षण का मह व घंटाकण महावीर गौतम कवली महा व ा े सव िस महायं ( ावली) जब महावीर ने एक राखी पू णमा का योितषी को कहां मह व तु हार व ा स ची है ? NON PROFIT PUBLICATION
  2. 2. FREE E CIRCULAR गु व योितष प का अग त 2011संपादक िचंतन जोशी गु व योितष वभागसंपक गु व कायालय 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIAफोन 91+9338213418, 91+9238328785, gurutva.karyalay@gmail.com,ईमेल gurutva_karyalay@yahoo.in, http://gk.yolasite.com/वेब http://www.gurutvakaryalay.blogspot.com/प का तुित िचंतन जोशी, व तक.ऎन.जोशीफोटो ाफ स िचंतन जोशी, व तक आटहमारे मु य सहयोगी व तक.ऎन.जोशी ( व तक सो टे क इ डया िल) ई- ज म प का E HOROSCOPE अ याधुिनक योितष प ित ारा Create By Advanced Astrology उ कृ भ व यवाणी क साथ े Excellent Prediction १००+ पेज म तुत 100+ Pages हं द / English म मू य मा 750/- GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWAR PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) INDIA Call Us – 91 + 9338213418, 91 + 9238328785 Email Us:- gurutva_karyalay@yahoo.in, gurutva.karyalay@gmail.com
  3. 3. अनु म राखी पू णमा वशेषराखी पू णमा का मह व 6 राखी पू णमा से जु ड पौरा णक कथाएं 8 ज मा मी वशेषकृ ण क मुख म े ांड दशन 10 ा रिचत कृ ण तो 16कृ ण मरण का मह व 11 ीकृ णा कम ् 17 ी कृ ण का नामकरण सं कार 12 कृ ण क विभ न मं े 19 ीकृ ण चालीसा 13 कृ ण मं 20व प ीकृ त ीकृ ण तो 14 ीकृ ण बीसा यं 21 ाणे र ीकृ ण मं 15 पयु षण वशेष ी नवकार मं (नम कार महामं ) 22 महावीरा क- तो म ् 33विभ न चम कार जैन मं 24 महावीर चालीसा 34जैन धम क चौबीस तीथकार े क जीवन का े 28 पयू षण का मह व 36सं ववरण जब महावीर ने एक योितषी को कहां तु हार व ादे वदशन तो म ् 31 38 स ची है ? ी मंगला क तो (जैन) 32 घंटाकण महावीर सव िस महायं 41अथ नव ह शांित तो (जैन) 32 गौतम कवली महा व ा ( े ावली) 45 थायी लेखसंपादक य 4 अग त-2011 मािसक त-पव- यौहार 57ज म वार से य व 40 अग त 2011 - वशेष योग 63वा तु िस ांत 42 दन क चौघ डये े 64ह तरे खा ान 44 दन क होरा - सूय दय से सूया त तक 65मािसक रािश फल 50 ह चलन अग त -2011 66अग त 2011 मािसक पंचांग 55 हमारे उ पादजैन धमक विश यं ो क सूची े 29 YANTRA LIST 70सव काय िस कवच 30 GEM STONE 72रािश र 54 सूचना 74सव रोगनाशक यं /कवच 67 हमारा उ े य 76मं िस कवच 69 मं िस साम ीयां पु संखया: 35,37,39.48.49,60,61
  4. 4. संपादक य य आ मय बंधु/ ब हन जय गु दे व र ाबंधन- राखी पू णमा भाई-बहन क बच िन वाथ े ेम का बंधन। भारतीय पंचांग क अनुशार े ावण मास क शु ल ेप क पू णमा क दन राखी पू णमा का े योहार मनाया जाता ह इस दन बहन अपने भाई या धमभाई क हाथ पर ेराखी बाँधती ह। भारतीय सं कृ ित म आज क भौितकतावाद समाज म भोग और े वाथ म िल व म भी ायःसभी संबंध म िनः वाथ और प व होता ह। भारतीय सं कृ ित सम मानव जीवन को समुचे मानव समाज को महानता क दशन कराने वाली सं कृ ित ह। ेभारतीय सं कृ ित म ी को कवल मा े उपभोग का साधन न समझकर उसका पूजन करने वाली महान सं कृ ित ह। क तु आजका पढा िलखा आधुिनक य अपने आपको सुधरा हु वा मानने वाले तथा पा ा य सं कृ ित काअंधा अनुकरण करक, े ी को समानता दलाने वाली खोखली भाषा बोलने वाल को पेहल भारत क पारं प रक सं कृ ितको पूण समझ लेना चा ह क पा ा य सं कृ ित से तो कवल समानता दलाई हो परं तु भारतीय सं कृ ित ने तो े ी कादे वी प म पूजन कया ह।पुराणो म उ लेख ह। य नाय तु पू य ते रम ते त दे वताः।भावाथ: जहाँ ी पूजी जाती है , उसका स मान होता है , वहाँ दे व रमते ह- वहाँ दे व का िनवास होता है । ऐसा भगवानमनु का वचन है । राखी बांधने क परं परा कई युग से चली आरह ह इस का प उ लेख वेद म है क दे व और असुर सं ाम मदे व क वजय ाि क कामना क िनिम े दे व इं ाणी ने ह मत हारे हु ए इं क हाथ म ह मत बंधाने हे तु राखी बाँधी थी ेउसी काल से दे वताओं क वजय से र ाबंधन का योहार शु हु आ। अिभम यु क र ा क िनिम कतामाता ने अिभम यु को े ुंराखी बाँधी थी। र ाबंधन पव पुरो हत ारा कया जाने वाला आशीवाद कम भी माना जाता है । ये ा ण ारा यजमान केदा हने हाथ म र ासू के प म बाँधा जाता है । ॥कृ णम ् व दे जग गु ॥ ज मा मी भगवान ीकृ ण क ज म का पव ह। ेभगवान ीकृ ण क म हमा अनंत व अपार ह। ीकृ ण क नाम क म हमा ला वणन करते हु वे ी शु दे वजी कहतेह। सकृ मनः कृ णापदार व दयोिनवेिशतं त ु णरािग यै रह। न ते यमं पाशभृ त त टान ् व नेऽ प प य त ह चीणिन कृ ताः॥भावाथ: जो मनु य कवल एक बार े ीकृ ण क गुण म े ेम करने वाले अपने िच को ीकृ ण क चरण कमल म ेलगा दे ते ह, वे पाप से छट जाते ह, फर उ ह पाश हाथ म िलए हु ए यमदू त क दशन ू े व न म भी नह ं हो सकते।
  5. 5. ीकृ ण क कसी अनोखी म हमा ह । ैभगवान ीकृ ण क भ ो क व य म उ लेख िमलता ह। क .. े े श यासनाटनाला ीडा नाना दकमसु। न वदु ः स तमा मानं वृ णयः कृ णचेतसः॥भावाथ: ीकृ ण को अपना सव व समझने वाले भ ीकृ ण म इतने त मय रहते थे क सोते, बैठते, घूमते, फरते,बातचीत करते, खेलते, नान करते और भोजन आ द करते समय उ ह अपनी सुिध ह नह ं रहती थी।य ह कारण ह क ीकृ ण क भ म ेमरस से डू बे भ ो को अपने जीवन म सभी बाधाओं एवं क से मुिमलती ह एवं अनंत सुख क ाि होती ह। जैनम जयित शाशनम जैन धम म पयु षण पव का वशेष मह व है । जैन सं दाय म पयु षण पव को सव े पव माना जाता है । जैन श द का अथजैन श द " जन" से बना है । जसका अथ है एसा पु ष जसने सम त भोग वृ य परअंकश कर िलया ह। अथात ् जसने अपने मन और सांसा रक इ छाओं पर िनयं ण कर िलया हो। ू जैन धम क 24 तीथकर इ ह ं वशेष गुण से प रपूण थे, अत: इन 24 क तीथकर क पदिच ो पर चलने वाले े े ेधम क अनुयायी को जैन धिम कहा जाता ह। े जैन अनुयाियय का कहना ह क जैन धम का उ म एवं इितहास अना दकाल और सनातन है । सामा यत: एसाभी मानाजाता है क जैन धम का मूल उन ाचीन पंरपराओं म रहा होगा, जो आय क आगमन से पूव इस दे श म े चिलत थीं। मूलत:जैन धम का उ म भारत म हु वा ह। भारत क साथ ह समय क साथ-साथ फलता हु वा े े े ायः आजव क हर दे श म जैन धम क मं दर एवं अनुयायी पाये जाते ह। े े जैन मुिनय क मत से उका मु य मं े ह नवकार महामं जैन जसम अनेक कार क िस समा हत ह एवंइस मं का योग य अपने विभ न काय उ े श क पूित हे तु एवं व क सम त जीवो क आ म क याण हे तु े ेकर सकता ह। यो क नवकार महामं अ यंत भावशाली मं ह। य द पूण िन ा व ा से नवकार मं का जपकयी जाये तो यहं मं साधक को त काल फल दान करने म पूण समथ ह। य हं कारण ह क जैन धम क अनुयायी ेनवकार मं का जप करता ह। जैन मुिनय क मत अनुशार नवकार महामं े अथवा नम कार महामं क मा यम से परमे ी भगव त क ेआराधना क जाती है उन भगव त म तप, याग, संयम, वैरा य इ या द सा वक गुण होते ह। जैन धम के मुखनवकार मं क मा यम से अ रहं त, िस , आचाय, उपा याय और साधु, इन पाँच भगवंत को परम इ े माना ह। इसिलयेइनको नमन करने क विध को नवकार महामं अथवा नम कार महामं कहा जाता है । जस कार हं द ू धम क पौरा णक शा े एवं धम ंथो म मानव जीवन क क याण व उ नित हे तु विभ न ेमं , तो , तुित, यं ो आ द का उ लेख िमलता ह उसी तरह जैन धम म भी वशेष मं ो, तो , तुित, यं इ या दका उ लेख कया गया ह। जसे अपना कर या जसके योग से साधारण मनु य अपने काय उ े य क पूित करसफलता ा कर सकता ह।सभी जैन बंधु/बहनो को गु व कायालय प रवार क और से… ॥िम छामी दु क म ् ॥ िचंतन जोशी
  6. 6. 6 अग त 2011 राखी पू णमा का मह व  िचंतन जोशीर ाबंधन- र ाबंधन अथात ् ेम का बंधन। र ाबंधन के हजारो वष पूव हमारे पूव जो न भारतीय सं कृ ितदन बहन भाई क हाथ पर राखी बाँधती ह। र ाबंधन क े े म र ाबंधन का उ सव शायद इस िलये शािमल कयासाथ ह भाई को अपने िनः वाथ ेम से बाँधती है । यो क र ाबंधन क तौहार को े प रवतन क उ े य े भारतीय सं कृ ित म आज के भौितकतावाद से बनाया गया हो?समाज म भोग और वाथ म िल व म भी ायः बहन ारा राखी हाथ पर बंधते ह भाई कसभी संबंध म िनः वाथ और प व होता ह। बदल जाए। राखी बाँधने वाली बहन क ओर वह वकृ त भारतीय सं कृ ित सम मानव जीवन को महानता न दे ख, एवं अपनी बहन का र ण भी वह े वयंक दशन कराने वाली सं कृ ित ह। भारतीय सं कृ ित म े करे । ज से बहन समाज म िनभय होकर घूम सक। े ी को कवल मा े भोगदासी न समझकर उसका पूजन वकृ त एवं मानिसकता वाले लोग उसका मजाककरने वाली महान सं कृ ित ह। उड़ाकर नीच वृ वाले लोगो को दं ड दे कर सबक िसखा क तु आजका पढा िलखा आधुिनक य अपने सक ह। ेआपको सुधरा हु वा मानने वाले तथा भाई को राखी बाँधने से पहले बहनपा ा य सं कृ ित का अंधा उसक म त क पर ितलक करती ेअनुकरण करक, े ी को ह। उस समय बहन भाई केसमानता दलाने वाली म त क क पूजा नह ंखोखली भाषा बोलने वाल अ पतु भाई क शु े वचारको पेहल भारत क और बु को िनमल करनेपारं प रक सं कृ ित को पूण हे तु कया जाता ह, ितलकसमझ लेना चा ह क लगाने से प रवतन कपा ा य सं कृ ित से तो कवल े अ ुत या समाई हु ई होतीसमानता दलाई हो परं तु भारतीय ह।सं कृ ित ने तो ी का पूजन कया ह। भाई क हाथ पर राखी बाँधकर बहन ेएसे ह नह ं कहाजाता ह। उससे कवल अपना र ण ह नह ं चाहती, अपने साथ-साथ ेय नाय तु पू य ते रम ते त दे वताः। सम त ी जाित क र ण क कामना रखती ह, इस क साथ े ेभावाथ: जहाँ ी पूजी जाती है , उसका स मान होता है , हं अपना भाई बा श ुओं और अंत वकार पर वजय ावहाँ दे व रमते ह- वहाँ दे व का िनवास होता है । ऐसा करे और सभी संकटो से उससे सुर त रहे, यह भावना भीभगवान मनु का वचन है । उसम िछपी होती ह। भारतीय सं कृ ित ी क ओर भोग क से न वेद म उ लेख है क दे व और असुर सं ाम म दे वदे खकर प व से, माँ क भावना से दे खने का आदे श क वजय ाि क कामना क िनिम दे व इं ाणी ने ह मत ेदे ने वाली सव े भारतीय सं कृ ित ह ह। हारे हु ए इं क हाथ म ह मत बंधाने हे तु राखी बाँधी थी। एवं े
  7. 7. 7 अग त 2011दे वताओं क वजय से र ाबंधन का योहार शु हु आ। र ाबंधन का एक मं भी है, जो पं डत र ा-सूअिभम यु क र ा क िनिम े कतामाता ने उसे राखी बाँधी ुं बाँधते समय पढ़ते ह :थी। येन ब ो बली राजा दानवे ो महाबलः। इसी संबंध म एक और कवदं ती ं िस है क तेन वां ितब नािम र े माचल माचलः॥दे वताओं और असुर क यु े म दे वताओं क वजय को लेकर भ व यो र पुराण म राजा बिल ( ीरामच रत मानस क बािल ेकछ संदेह होने लगा। तब दे वराज इं ने इस यु ु म मुखता नह ) जस र ाबंधन म बाँधे गए थे, उसक कथा अ सर ंसे भाग िलया था। दे वराज इं क प ी इं ाणी ावण पू णमा उ ृ त क जाती है । बिल क संबंध म व णु क पाँचव अवतार े ेक दन गु े बृ ह पित क पास गई थी तब उ ह ने वजय क े े (पहला अवतार मानव म राम थे) वामन क कथा है क बिलिलए र ाबंधन बाँधने का सुझाव दया था। जब दे वराज इं से संक प लेकर उ ह ने तीन कदम म तीन लोक मरा स से यु करने चले तब उनक प ी इं ाणी ने इं के सबकछ नाप िलया था। व तुतः दो ह कदम म वामन ु पीहाथ म र ाबंधन बाँधा था, जससे इं वजयी हु ए थे। व णु ने सबकछ नाप िलया था और फर तीसरे कदम,जो ु बिल क िसर पर रखा था, उससे उसे पाताल लोक पहु ँचा दया े अनेक पुराण म ावणी पू णमा को पुरो हत ारा था। लगता है र ाबंधन क परं परा तब से कसी न कसी पकया जाने वाला आशीवाद कम भी माना जाता है । ये ा ण म व मान थी। ारा यजमान क दा हने हाथ म बाँधा जाता है । े पुराण म ऐसी भी मा यता है क मह ष दु वासा ने संपूण ाण ित त 22 गेज शु ह के कोप से बचने हे तु र ाबंधन क यव था द थी। ट ल म िनिमत अखं डतमहाभारत युग म भगवान ीकृ ण ने भी ऋ षय को पू यमानकर उनसे र ा-सू बँधवाने को आव यक माना था ता कऋ षय क तप बल से भ े क र ा क जा सक। े शिन तैितसा यं ऐितहािसक कारण से म ययुगीन भारत म र ाबंधन शिन ह से संबंिधत पीडा क िनवारण हे तु ेका पव मनाया जाता था। शायद हमलावर क वजह से वशेष लाभकार यं । मू य: 550 से 8200म हलाओं क शील क र ा हे तु इस पव क मह ा म इजाफा ेहु आ हो। तभी म हलाएँ सगे भाइय या मुँहबोले भाइय को GURUTVA KARYALAY 92/3. BANK COLONY, BRAHMESHWARर ासू बाँधने लगीं। यह एक धम-बंधन था। PATNA, BHUBNESWAR-751018, (ORISSA) र ाबंधन पव पुरो हत ारा कया जाने वाला Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com,आशीवाद कम भी माना जाता है । ये ा ण ारा gurutva_karyalay@yahoo.in, Our Website:- http://gk.yolasite.com/ andयजमान क दा हने हाथ म बाँधा जाता है । े http://gurutvakaryalay.blogspot.com/
  8. 8. 8 अग त 2011 राखी पू णमा से जु ड पौरा णक कथाएं  व तक.ऎन.जोशीवामनावतार कथा कर दया कतु बिल अपने वचन से न फरे और तीन पग ं भूिम दान कर द । अब वामन प म भगवान व णु ने एक पग म वग और दू सरे पग म पृ वी को नाप िलया। तीसरा पैर कहाँ रख? बिल क सामने संकट उ प न हो गया। य द वह अपना वचन े नह ं िनभाता तो अधम होता। आ खरकार उसने अपना िसर भगवान क आगे कर दया और कहा तीसरा पग आप मेरे े िसर पर रख द जए। वामन भगवान ने वैसा ह कया। पैर रखते ह वह रसातल लोक म पहु ँ च गया। जब बाली रसातल म चला गया तब बिल ने अपनी भ क बल से भगवान को रात- दन अपने सामने रहने का े वचन ले िलया और भगवान व णु को उनका ारपाल बनना पड़ा। भगवान क रसातल िनवास से परे शान क य द वामी े रसातल म ारपाल बन कर िनवास करगे तो बैकठ लोक का ुं या होगा? इस सम या क समाधान क िलए ल मी जी को े े नारद जी ने एक उपाय सुझाया। ल मी जी ने राजा बिल के पास जाकर उसे र ाब धन बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार व प अपने पित भगवान व णु को अपने साथ ले आयीं। उस दन ावण मास क पू णमा ितिथ थी यथा र ा- पोरा णक कथा क अनुशार एकबार सौ य े पूण करलेने पर दानवो क राजा बिल क मन म े े वग ाि क बंधन मनाया जाने लगा।इ छा बल हो गई तो इ का िसंहासन डोलने लगा। इआ द दे वताओं ने भगवान व णु से र ा क ाथना क । मंगल यं से ऋण मुभगवान ने वामन अवतार लेकर ा ण का वेष धारण कर मंगल यं को जमीन-जायदाद क ववादो को ेिलया और राजा बिल से िभ ा मांगने पहु ँ च गए। भगवान हल करने क काम म लाभ दे ता ह, इस क अित र े ेव णुने बिल से तीन पग भूिम िभ ा म मांग ली। य को ऋण मु हे तु मंगल साधना से अित शी लाभ ा होता ह। ववाह आ द म मंगली जातक बिल क गु शु दे वजी ने ा ण प धारण कए हु ए े क क याण क िलए मंगल यं े े क पूजा करने से ी व णु को पहचान िलया और बिल को इस बारे म सावधान वशेष लाभ ा होता ह। ाण ित त मंगल यं के पूजन से
  9. 9. 9 अग त 2011भ व य पुराण क कथा भ व य पुराण क एक कथा क अनुसार एक बार ेदे वता और दानव म बारह वष तक यु हु आ पर तु दे वता वजयी नह ं हु ए। इं हार क भय से दु:खी होकर दे वगु ेबृ ह पित क पास वमश हे तु गए। गु बृ ह पित क सुझाव पर े ेइं क प ी महारानी शची ने ावण शु ल पू णमा क दन े विध- वधान से त करके र ासू तैयार कएऔर वा तवाचन क साथ ा ण क उप थित म इं ाणी ने ेवह सू इं क दा हनी कलाई म बांधा जसक फल व प ेइ स हत सम त दे वताओं क दानव पर वजय हु ई।र ा वधान क समय िन न जस मं े का उ चारण कयागया था उस मं का आज भी विधवत पालन कया जाता है : "येन ब ोबली राजा दानवे ो महाबल: । तेन वामिभब नािम र े मा चल मा चल ।।" इस मं का भावाथ है क दानव क महाबली राजा ेबिल जससे बांधे गए थे, उसी से तु ह बांधता हू । हे र े! ँ(र ासू ) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। महाभारत म ह र ाबंधन से संबंिधत कृ ण और ौपद का यह र ा वधान वण मास क पू णमा को ातः एक और वृ ांत िमलता है । जब कृ ण ने सुदशन च सेकाल संप न कया गया यथा र ा-बंधन अ त व म िशशुपाल का वध कया तब उनक तजनी म चोट आ गई।आया और वण मास क पू णमा को मनाया जाने लगा। ौपद ने उस समय अपनी साड़ फाड़कर उनक उँ गली परमहाभारत संबंधी कथा प ट बाँध द । यह ावण मास क पू णमा का दन था। महाभारत काल म ौपद ारा ी कृ ण को तथा ीकृ ण ने बाद म ौपद क चीर-हरण क समय े ेक ती ारा अिभम यु को राखी बांधने क वृ ांत िमलते ह। ु े उनक लाज बचाकर भाई का धम िनभाया था।। सर वती कवच एवं यं उ म िश ा एवं व ा ाि क िलये वंसत पंचमी पर दु ल भ तेज वी मं श े ारा पूण ाण- ित त एवं पूण चैत य यु सर वती कवच और सर वती यं के योग से सरलता एवं सहजता से मां सर वती क कृ पा ा कर। मू य:280 से 1450 तक GURUTVA KARYALAY Call us: 91 + 9338213418, 91+ 9238328785 Mail Us: gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in,
  10. 10. 10 अग त 2011 कृ ण क मुख म े ांड दशन  िचंतन जोशी य द आपको लगता ह मने िम ट खाई ह, तो वयं मेरा मुख दे ख ले। माँ ने कहा य द ऐसा है तो तू अपना मुख खोल। लीला करने क िलए बाल कृ ण ने अपना मुख माँ े क सम े खोल दया। यशोदा ने जब मुख क अंदर दे खते े ह उसम संपूण व दखाई पड़ने लगा। अंत र , दशाएँ, प, पवत, समु , पृ वी,वायु, व ुत, तारा स हत वगलोक, जल, अ न, वायु, आकाश इ या द विच संपूण व एक ह काल म दख पड़ा। इतना ह नह , यशोदा ने ं उनक मुख म े ज क साथ े वयं अपने आपको भी दे खा। इन बात से यशोदा को तरह-तरह क तक- वतक े एक बार बलराम स हत वाल बाल खेल रह थे होने लगे। या म व न दे ख रह हू ँ ! या दे वताओं कखेलते-खेलते यशोदा क पास पहु ँ चे और यशोदाजी से कहा े कोई माया ह या मेर बु ह यामोह ह या इस मेरेमाँ! कृ ण ने आज िम ट खाई ह। यशोदा ने कृ ण के कृ ण का ह कोई वाभा वक भावपूण चम कार ह।हाथ को पकड़ िलया और धमकाने लगी क तुमने अ त म उ ह ने यह ढ़ िन य कया क अव य हिम ट य खाई! यशोदा को यह भय था क कह ं िम ट इसी का चम कार है और िन य ह ई र इसके प मखाने से कृ ण कोई रोग न लग जाए। माँ क डांट से अवत रत हु एं ह। तब उ ह ने कृ ण क तुित क उसकृ ण तो इतने भयभीत हो गए थे क वे माँ क ओर श व प पर को म नम कार करती हू ँ । कृ ण नेआँख भी नह ं उठा पा रहे थे। तब यशोदा ने कहा तूने जब दे खा क माता यशोदा ने मेरा त व पूण तः समझएका त म िम ट य खाई! िम ट खाते हु ए तुजे िलया ह तब उ ह ने तुरंत पु नेहमयी अपनी श पबलराम स हत और भी वाल ने दे खा ह। कृ ण ने कहा- माया बखेर द जससे यशोदा ण म ह सबकछ भूल ुिम ट मने नह ं खाई ह। ये सभी लोग झुठ बोल रहे ह। गई। उ ह ने कृ ण को उठाकर अपनी गोद म उठा िलया। भा य ल मी द बी सुख-शा त-समृ क ाि क िलये भा य ल मी द बी :- ज से धन ि , ववाह योग, यापार े वृ , वशीकरण, कोट कचेर क काय, भूत ेत बाधा, मारण, स मोहन, ता े क बाधा, श ु भय, चोर भय जेसी अनेक परे शािनयो से र ा होित है और घर मे सुख समृ क ाि होित है , भा य ल मी द बी मे लघु ी फ़ल, ह तजोड (हाथा जोड ), िसयार िस गी, ब ल नाल, शंख, काली- सफ़द-लाल गुंजा, इ े जाल, माय जाल, पाताल तुमड जेसी अनेक दु ल भ साम ी होती है । मू य:- Rs. 910 से Rs. 8200 तक उ ल गु व कायालय संपक : 91+ 9338213418, 91+ 9238328785
  11. 11. 11 अग त 2011 कृ ण मरण का मह व  िचंतन जोशी ी शुकदे वजी राजा पर त ् से कहते ह- श यासनाटनाला ीडा नाना दकमसु। सकृ मनः कृ णापदार व दयोिनवेिशतं त ु णरािग यै रह। न वदु ः स तमा मानं वृ णयःकृ णचेतसः॥ न ते यमं पाशभृ त त टान ् व नेऽ प प य त ह भावाथ: ीकृ ण को अपना सव व समझने वाले भ चीणिन कृ ताः॥ ीकृ ण म इतने त मय रहते थे क सोते, बैठते, घूमते,भावाथ: जो मनु य कवल एक बार े ीकृ ण क गुण म े फरते, बातचीत करते, खेलते, नान करते और भोजन ेम करने वाले अपने िच को ीकृ ण क चरण कमल े आ द करते समय उ ह अपनी सुिध ह नह ं रहती थी।म लगा दे ते ह, वे पाप से छट जाते ह, फर उ ह पाश ू वैरेण यं नृ पतयः िशशुपालपौ -हाथ म िलए हु ए यमदू त क दशन े व नम भी नह ं हो शा वादयो गित वलास वलोकना ैः।सकते। याय त आकृ तिधयः शयनासनादौ त सा यमापुरनुर िधयां पुनः कम॥ ् अ व मृ ितः कृ णपदार व दयोः भावाथ: जब िशशुपाल, शा व और पौ क आ द राजा णो यभ ण शमं तनोित च। वैरभाव से ह खाते, पीते, सोते, उठते, बैठते हर व ी स व य शु ं परमा मभ ं ह र क चाल, उनक िचतवन आ द का िच तन करने के ानं च व ान वरागयु म॥ ् कारण मु हो गए, तो फर जनका िच ी कृ ण मभावाथ: ीकृ ण क चरण कमल का े मरण सदा बना अन य भाव से लग रहा है , उन वर भ क मु ेरहे तो उसी से पाप का नाश, क याण क ाि , अ तः होने म तो संदेह ह या ह?करण क शु , परमा मा क भ और वैरा ययु ान- व ान क ाि अपने आप ह हो जाती ह। एनः पूव कृ तं य ाजानः कृ णवै रणः। जहु व ते तदा मानः क टः पेश कृ तो यथा॥ पुंसां किलकृ ता दोषा यदे शा मसंभवान। ् भावाथ: ीकृ ण से े ष करने वाले सम त नरपितगण सवा ह रत िच थो भगवा पु षो मः॥ अ त म ी भगवान के मरण के भाव से पूव संिचतभावाथ:भगवान पु षो म ीकृ ण जब िच म वराजते पाप को न कर वैसे ह भगव ू प हो जाते ह, जैसेह, तब उनके भाव से किलयुग क सारे पाप और े य, पेश कृ त के यान से क ड़ा त ू प हो जाता है, अतएवदे श तथा आ मा क दोष न े हो जाते ह। ीकृ ण का मरण सदा करते रहना चा हए। योितष संबंिधत वशेष परामश योित व ान, अंक योितष, वा तु एवं आ या मक ान स संबंिधत वषय म हमारे 28 वष से अिधक वष केअनुभव क साथ े योितस से जुडे नये-नये संशोधन क आधार पर आप अपनी हर सम या क सरल समाधान े े ाकर कर सकते ह। गु व कायालय संपक : 91+ 9338213418, 91+ 9238328785
  12. 12. 12 अग त 2011 ी कृ ण का नामकरण सं कार  िचंतन जोशी वसुदेवजी क ाथना पर यदु ओं क पुरो हत महातप वी गगाचायजी े ज नगर पहु ँ चे। उ ह दे खकर नंदबाबाअ यिधक स न हु ए। उ ह ने हाथ जोड़कर णाम कया और उ ह व णु तु य मानकर उनक विधवत पूजा क ।इसक प ात नंदजी ने उनसे कहा आप क या मेरे इन दोन ब च का नामकरण सं कार कर द जए। े ृ इस पर गगाचायजी ने कहा क ऐसा करने म कछ अड़चन ह। म यदु वंिशय का पुरो हत हू,ँ य द म तु हारे ुइन पु का नामकरण सं कार कर दू ँ तो लोग इ ह दे वक का ह पु मानने लगगे, य क कस तो पहले से ह ंपापमय बु वाला ह। वह सवदा िनरथक बात ह सोचता है । दू सर ओर तु हार व वसुदेव क मै ी है । अब मु य बात यह ह क दे वक क आठवीं संतान लड़क नह ं हो सकती य क योगमाया ने कस से यह ंकहा था अरे पापी मुझे मारने से या फायदा है ? वह सदै व यह सोचता है क कह ं न कह ं मुझे मारने वाला अव यउ प न हो चुका ह। य द म नामकरण सं कार करवा दू ँ गा तो मुझे पूण आशा ह क वह मेरे ब च को मारडालेगा और हम लोग का अ यिधक अिन करे गा। नंदजी ने गगाचायजी से कहा य द ऐसी बात है तो कसी एका त थान म चलकर विध पूव क इनके जाित सं कार करवा द जए। इस वषय म मेरे अपने आदमी भी न जान सकगे। नंद क इन बात को सुनकरगगाचाय ने एका त म िछपकर ब चे का नामकरण करवा दया। नामकरण करना तो उ ह अभी ह था, इसीिलएवे आए थे। गगाचायजी ने वसुदेव से कहा रो हणी का यह पु गुण से अपने लोग क मन को े स न करे गा। अतःइसका नाम राम होगा। इसी नाम से यह पुकारा जाएगा। इसम बल क अिधकता अिधक होगी। इसिलए इसे लोगबल भी कहगे। यदु वंिशय क आपसी फट िमटाकर उनम एकता को यह ू था पत करे गा, अतः लोग इसे संकषण भीकहगे। अतः इसका नाम बलराम होगा। अब उ ह ने यशोदा और नंद को ल य करक कहा- यह तु हारा पु े येक युग म अवतार हण करतारहता ह। कभी इसका वण ेत, कभी लाल, कभी पीला होता है । पूव के येक युग म शर र धारण करते हु ए इसकेतीन वण हो चुक ह। इस बार क णवण का हु आ है, अतः इसका नाम क ण होगा। तु हारा यह पु े ृ ृ पहले वसुदेव केयहाँ ज मा ह, अतः ीमान वासुदेव नाम से व ान लोग पुकारगे। तु हारे पु क नाम और े प तो िगनती क परे ह, उनम से गुण और कम अनु प कछ को म जानता हू ँ । े ुदू सरे लोग यह नह ं जान सकते। यह तु हारे गोप गौ एवं गोकल को आनं दत करता हु आ तु हारा क याण करे गा। ुइसके ारा तुम भार वप य से भी मु रहोगे। इस पृ वी पर जो भगवान मानकर इसक भ करगे उ ह श ु भी परा जत नह ं कर सकगे। जस तरहव णु क भजने वाल को असुर नह ं परा जत कर सकते। यह तु हारा पु े स दय, क ित, भाव आ द म व णु केस श होगा। अतः इसका पालन-पोषण पूण सावधानी से करना। इस कार क ण क ृ े वषय म आदे श दे करगगाचाय अपने आ म को चले गए।
  13. 13. 13 अग त 2011 ॥ ीकृ ण चालीसा ॥दोहा कितक महा असुर संहार्यो। कस ह कस पक ड़ दै मार्यो॥ े ं ेबंशी शोिभत कर मधुर, नील जलद तन याम। मात- पता क ब द छड़ाई। उ सेन कहँ राज ु दलाई॥अ णअधरजनु ब बफल, नयनकमलअिभराम॥ म ह से मृ तक छह सुत लायो। मातु दे वक शोक िमटायो॥पूण इ , अर व द मुख, पीता बर शुभ साज। भौमासुर मुर दै य संहार । लाये षट दश सहसकमार ॥ ुजय मनमोहन मदन छ व, कृ णच महाराज॥ दै भीम हं तृ ण चीर सहारा। जरािसंधु रा स कहँ मारा॥जय यदु नंदन जय जगवंदन। जय वसुदेव दे वक न दन॥ असुर बकासुर आ दक मार्यो। भ न क तब क िनवार्यो॥ ेजय यशुदा सुत न द दु लारे । जय भु भ न के ग तारे ॥ द न सुदामा क दु ःख टार्यो। तंद ु ल तीन मूंठ मुख डार्यो॥ ेजय नट-नागर, नाग नथइया॥ कृ ण क हइया धेनु चरइया॥ ेम क साग े वदु र घर माँगे। दु य धन क मेवा े यागे॥पुिन नख पर भु िग रवर धारो। आओ द नन क िनवारो॥ लखी ेम क म हमा भार । ऐसे याम द न हतकार ॥वंशी मधुर अधर ध र टे रौ। होवे पूण वनय यह मेरौ॥ भारत क पारथ रथ हाँक। िलये च े े कर न हं बल थाक॥ ेआओ ह र पुिन माखन चाखो। आज लाज भारत क राखो॥ िनज गीता के ान सुनाए। भ न दय सुधा वषाए॥गोल कपोल, िचबुक अ णारे । मृ द ु मु कान मो हनी डारे ॥ मीरा थी ऐसी मतवाली। वष पी गई बजाकर ताली॥रा जत रा जव नयन वशाला। मोर मुकट वैज तीमाला॥ ु राना भेजा साँप पटार । शाली ाम बने बनवार ॥कडल ुं वण, पीत पट आछे । क ट क कणी काछनी काछे ॥ ं िनजमाया तुम विध हं दखायो। उर ते संशय सकल िमटायो॥नील जलज सु दरतनु सोहे । छ बल ख, सुरनर मुिनमन मोहे ॥ तब शत िन दा क र त काला। जीवन मु भयो िशशुपाला॥म तक ितलक, अलक घुँघराले। आओ कृ ण बांसुर वाले॥ जब हं ौपद टे र लगाई। द नानाथ लाज अब जाई॥क र पय पान, पूतन ह तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥ तुरत ह वसन बने नंदलाला। बढ़े चीर भै अ र मुँह काला॥मधुवन जलतअिगन जब वाला। भैशीतललखत हं नंदलाला॥ अस अनाथ क नाथ क हइया। डू बत भंवर बचावइ नइया॥ ेसुरपित जब ज च यो रसाई। मूसर धार वा र वषाई॥ सु दरदास आस उर धार । दया क जै बनवार ॥लगत लगत ज चहन बहायो। गोवधन नख धा र बचायो॥ नाथ सकल मम कमित िनवारो। ु महु बेिग अपराध हमारो॥ल ख यसुदा मन म अिधकाई। मुखमंह चौदह भुवन दखाई॥ खोलो पट अब दशनद जै। बोलो कृ ण क हइया क जै॥दु कस अित उधम मचायो। को ट कमल जब फल मंगायो॥ ं ू दोहानािथ कािलय हं तब तुम ली ह। चरण िच दै िनभय क ह॥ यह चालीसा कृ ण का, पाठ करै उर धा र।क र गो पन संग रास वलासा। सबक पूरण कर अिभलाषा॥ अ िस नविनिध फल, लहै पदारथ चा र॥ अ ल मी कवच अ ल मी कवच को धारण करने से य पर सदा मां महा ल मी क कृ पा एवं आशीवाद बना रहता ह। ज से मां ल मी क अ े प (१)-आ द ल मी, (२)-धा य ल मी, (३)-धैर य ल मी, (४)- गज ल मी, (५)-संतान ल मी, (६)- वजय ल मी, (७)- व ा ल मी और (८)-धन ल मी इन सभी पो का वतः अशीवाद ा होता ह। मू य मा : Rs-1050
  14. 14. 14 अग त 2011 व प ीकृ त ीकृ ण तोव प य ऊचुः वं परमं धाम िनर हो िनरहं कृितः।िनगु ण िनराकारः साकारः सगुणः वयम ् ॥१॥सा प िनिल ः परमा मा िनराकृ ितः। कृ ितः पु ष वं च कारणं च तयोः परम ् ॥२॥सृ थ यंत वषये ये च दे वा यः मृ ताः।ते वदं शाः सवबीजा - व णु-महे राः ॥३॥य य लो नां च ववरे चाऽ खलं व मी रः।महा वरा महा व णु तं त य जनको वभो ॥४॥तेज वं चाऽ प तेज वी ानं ानी च त परः।वेदेऽिनवचनीय वं क वां तोतुिमहे रः ॥५॥महदा दसृ सू ं पंचत मा मेव च।बीजं वं सवश नां सवश व पकः ॥६॥सवश रः सवः सवश या यः सदा। वमनीहः वयं योितः सवान दः सनातनः ॥७॥अहो आकारह न वं सव व हवान प।सव याणां वषय जानािस ने यी भवान ् ।८॥सर वती जड भूता यत ् तो े य न पणे।जड भूतो महे श शेषो धम विधः वयम ् ॥९॥पावती कमला राधा सा व ी दे वसूर प। ॥११॥इित पेतु ता व प य त चरणा बुजे।अभयं ददौ ता यः स नवदने णः ॥१२॥व प ीकृ तं तो ं पूजाकाले च यः पठे त। स गितं व प ीनां ्लभते नाऽ संशयः ॥१३॥॥ इित ी वैवत व प ीकृ तं कृ ण तो ं समा म॥ ्इस ीकृ ण तो का िनयिमत पाठ करने सेभगवान ् ीकृ ण अपने भ पर िनःस दे ह स न होते है । यह तो य अभय को दान करने वाला ह।
  15. 15. 15 अग त 2011 ाणे र ीकृ ण मं  िचंतन जोशीमं :- "ॐ ऐं ीं लीं ाण व लभाय सौः सौभा यदाय ीकृ णाय वाहा।"विनयोगः- ॐ अ य ी ाणे र ीकृ ण मं य भगवान ् ीवेद यास ऋ षः,गाय ी छं दः-, ीकृ ण-परमा मा दे वता, लीं बीजं, ीं श ः, ऐं क लक, ॐ यापकः, मम सम त- लेश-प रहाथ, चतुव ग- ा ये, ंसौभा य वृ यथ च जपे विनयोगः।ऋ या द यासः- ीवेद यास ऋषये नमः िशरिस, गाय ी छं दसे नमः मुख, े ीकृ ण परमा मा दे वतायै नमः द, लीं बीजायनमः गु े, ीं श ये नमः नाभौ, ऐं क लकाय नमः पादयो, ॐ यापकाय नमः सवा गे, मम सम त लेश प रहाथ, चतुव ग ा ये, सौभा य वृ यथ च जपे विनयोगाय नमः अंजलौ।कर- यासः- ॐ ऐं ीं लीं अंगु ा यां नमः ाणव लभाय तजनी यां वाहा, सौः म यमा यां वष , सौभा यदाय अनािमका यां हु ं ीकृ णाय किन का यां वौष , वाहा करतलकरपृ ा यां फ ।अंग- यासः- ॐ ऐं ीं लीं दयाय नमः, ाण व लभाय िशरसे वाहा, सौः िशखायै वष , सौभा यदाय िशखायै कवचाय हु ,ं ीकृ णाय ने - याय वौष , वाहा अ ाय फ । यानः- "कृ णं जग मपहन- प-वण, वलो य ल जाऽऽकिलतां ु मरा याम ् ।मधूक-माला-युत-कृ ण-दे हं, वलो य चािलं य ह रं मर तीम ् ।। "भावाथ: संसार को मु ध करने वाले भगवान ् कृ ण क प-रं ग को दे खकर ेम पूण होकर गो पयाँ ल जापूव क याकल होती ह और े ुमन-ह -मन ह र को मरण करती हु ई भगवान ् कृ ण क मधूक-पु प क माला से वभु षत दे ह का आिलंगन करती ह। इस मंका विध- वधान से १,००,००० जाप करने का वधान ह। ाण ित त दु गा बीसा यं शा ो मत क अनुशार दु गा बीसा यं े दु भा य को दू र कर य क सोये हु वे भा य को जगाने वाला माना े गया ह। दु गा बीसा यं ारा य को जीवन म धन से संबंिधत सं याओं म लाभ ा होता ह। जो य आिथक सम यासे परे शान ह , वह य य द नवरा म ाण ित त कया गया दु गा बीसा यं को थाि कर लेता ह, तो उसक धन, रोजगार एवं यवसाय से संबंधी सभी सम य का शी ह अंत होने लगता ह। नवरा क दनो े म ाण ित त दु गा बीसा यं को अपने घर-दु कान-ओ फस-फ टर म ै था पत करने से वशेष लाभ ा होता ह, य शी ह अपने यापार म वृ एवं अपनी आिथक थती म सुधार होता दे खगे। संपूण ाण ित त एवं पूण चैत य दु गा बीसा यं को शुभ मुहू त म अपने घर-दु कान-ओ फस म था पत करने से वशेष लाभ ा होता ह। मू य: Rs.550 से Rs.8200 तक
  16. 16. 16 अग त 2011 ा रिचत कृ ण तोोवाच : र र हरे मां च िनम नं कामसागरे । मं िस ा दु क ितजलपूण च दु पारे बहु संकटे ॥१॥ एकमुखी ा -Rs- 1250,2800 भ व मृ ितबीजे च वप सोपानदु तरे । दो मुखी ा -Rs- 100,151 अतीव िनमल ानच ुः- छ नकारणे ॥२॥ तीन मुखी ा -Rs- 100,151 ज मोिम-संगस हते यो ष न ाघसंकले। ु चार मुखी ा -Rs- 55,100 रित ोतःसमायु े ग भीरे घोर एव च ॥३॥ पंच मुखी ा -Rs- 28,55 थमासृ त पे च प रणाम वषालये। छह मुखी ा -Rs- 55,100 यमालय वेशाय मु ाराित व तृ तौ ॥४॥ बु या तर या व ानै रा मानतः वयम। ् सात मुखी ा -Rs- 120,190 वयं च व कणधारः सीद मधुसूदन ॥५॥ आठ मुखी ा -Rs- 820,1250 म धाः कितिच नाथ िनयो या भवकम ण। नौ मुखी ा -Rs- 820,1250 स त व ेश वधयो हे व े र माधव ॥६॥ दसमुखी ा -Rs- ........ न कम े मेवेद लोकोऽयमी सतः। यारहमुखी ा -Rs- 2800 तथाऽ प न पृ हा कामे व यवधायक ॥७॥ े बारह मुखी ा -Rs- 3600 हे नाथ क णािस धो द नब धो कृ पां क । ु तेरह मुखी ा -Rs- 6400 वं महे श महा ाता दु ः व नं मां न दशय ॥८॥ चौदह मुखी ा -Rs- 19000 इ यु वा जगतां धाता वरराम सनातनः। गौर षंकर ा -Rs- ..... यायं यायं म पदा जं श तस मार मािमित ॥९॥ ् णा च कृ तं तो ं भ यु यः पठे त। ् गु व कायालय: Bhubaneswar- 751 018, (ORISSA) स चैवाकम वषये न िनम नो भवे ुवम ् ॥१०॥ INDIA Call Us: 91+ 9338213418, 91+ मम मायां विन ज य स ानं लभते ुवम। ् 9238328785, E-mail Us:- इह लोक भ े यु ो म वरो भवेत ् ॥११॥ gurutva.karyalay@gmail.com, gurutva_karyalay@yahoo.in, ॥ इित ी दे वकृ तं कृ ण तो ं स पूणम॥ ्

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